Wednesday, December 17, 2008

बारिश की बूंदें.......

सुनो,सुनो......
मैं हूँ बारिश की बूंदें
बादलों में छुपकर बैठी
और लहराई शहर-शहर,
गाँव-गाँव और डगर-डगर,
सागर,नदी,पर्वत-पर्वत..........
जहाँ भी चाहा बरस गई,
मिट्टी की मादक गंध बन गई
छत से टप-टप का साज बजाया
कवि ह्रदय को गान दिया !
कहीं विरह का गीत बनी,
कहीं सुख की शीतलता
और कहीं प्रलय बन बैठी.........
मैं ही सुख हूँ,
मैं ही दुःख हूँ,
मैं हूँ बारिश की बूंदें.............................

10 comments:

  1. आप की कविता ने तो फ़िर से वचपन मै लोटा दिया, ओर कविता कही खुशी बिखेरती है तो कही ऊदासी...
    लेकिन बहुत सुंदर लगी.
    धन्यवाद

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  2. purane din yaad karane ke liye dhanywaad sundar kaphi sundar..

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  3. aapki is rachna ne mujhe ek kavita yaad kara di .........

    hawa hoon hawa main basanti hawa hoon.........

    aapne bhi shaayad kabhi padhi ho.

    bahut sundar

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  4. barush ki bunde hi to kabhi sukh barsati hai kabhi dukh

    acha raha barish me bheegna shabdo ki

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  5. Rashmi ji,
    Lahren sath dengee,Aur Barish ki boonden donon hee kavitaen bal man ke anuroop hain .Badhai sweekar karen.
    Hemant

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  6. आप की कविता ने तो फ़िर से वचपन मै लोटा दिया, ओर कविता कही खुशी बिखेरती है तो कही ऊदासी...
    लेकिन बहुत सुंदर लगी.
    धन्यवाद

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  7. बहुत सुन्दर रचना । आभार

    ढेर सारी शुभकामनायें.

    SANJAY KUMAR
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  8. आज आपको पढना बहुत सुखद रहा.

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  9. snehil maa se lekar prachand roop me maa chandi see....barish kee ye boondein....prakriti kee takat ka andaaja karaati shasakt rachna..sadar badhayee ke sath

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